भाषा , संवाद एवं स्वबोध
भाषा एक दूसरे के साथ संवाद का माध्यम है । जो भाषा दूसरों को समझ आ जाएं वह भाषा में संवाद करना सहज होता है । सहजता होने से हमें विषय समझना एवं एक दूसरे को विषय समझाना, सरल होता है ।
एक ही प्रांत के दो नागरिक एक ही भाषा बोले यह विचार जितना सरल, सहज एवं स्वाभाविक है , वैसे ही दो निराले प्रांत के नागरिक , एक दूसरे की भाषा निराली होने के पश्चात भी किसी एक ही भाषा में संवाद करे यह विचार भी उतना सरल , सहज एवं स्वाभाविक है ।
स्वतंत्रता से पूर्व कई अनेक वर्षों से हर एक प्रांत में अपनी अपनी भाषा बोली जाती थी। उस समय भी एक प्रांत के नागरिक दूसरे प्रांत में व्यापार करने हेतु यातायात करते थे । उस समय भी तो एक भाषा में संवाद न होना कठिनाइयां उत्पन्न करता होगा । परन्तु , उस समय के लोगों ने उन कठिनाइयांयों को दूर करने का मार्ग निकाला होगा । मेरे अनुसार वह मार्ग एक दूसरे की भाषा को अच्छे ढंग से समझना यही हुआ होगा ।
स्वतंत्रता के पश्चात उस समय के राज्यकर्ताओंने संविधान में भाषावार प्रांत रचना की ,जिसके कारण महाराष्ट्र में मराठी , कर्नाटक में कन्नडा, गुजरात में गुजराती बंगाल में बंगाली भाषा का उपयोग होगा एवं उस प्रांत की भाषा उसी प्रांत की मातृभाषा हो इसकी संविधानात्मक रचना की गई ।
उस समय इस संवैधानिक बदलाव का कितना उपयोग एवं दुरुपयोग होगा , कैसे होगा यह किसीने नहीं सोचा होगा....परन्तु आज हम देखते है तो ध्यान में आता है कि उससे आज की परिस्थिति में हमारे सामान्य मानवी जीवन पर विशुद्ध परिणाम हुआ है ।
वह परिणाम यह है कि हम एक दूसरे की भाषाओंको अपनेपन से देख नहीं रहे है । मेरी मातृभाषा मराठी है , परन्तु दूसरे प्रांत में बोली जाने वाली हिंदी , बंगाली ,तेलगु , तमिल जैसे अन्य कई भाषा भी मेरे देश की भाषाएं है तथा वह भाषा एवं भाषाएं सीखने हेतु मेरे मन में कोई खेद नहीं आना चाहिए , यह भाव उत्पन्न न होना यह सबसे बड़ी कठिनाई है । यह भाव किसीभी कारण कायम रहा तो आने वाले समय में , यह संपूर्ण भारत के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बनने वाली है । इसका हमे बारीकिसे विचार करने की आवश्यकता है ।
हम जिस प्रांत में जाते है उस प्रांत की भाषा समझना , उसमें संवाद करना , उनकी जो भी अच्छी सभ्यताएं है उनको अपनाने से भाषा का विवाद संपूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगा ऐसा मेरा अनुमान है ।
इसके लिए हम स्वयं जब भी स्वभाषा का विचार मन में लाते है , उसी समय कोई दूसरा व्यक्तिभी उसकी मातृभाषा का एवं स्वभाषा का विचार मन में लाता है ,इसके कारण एक दूसरे के साथ संवाद करते समय स्वभाषा का अभिमान जागृत होता है ।
स्वभाषा का स्वाभिमान होना तथा स्वभाषा का अभिमान होना यह दो विरुद्ध विषय है । परन्तु , इसका अर्थ यह नहीं है कि हमे दूसरी भाषा के प्रति दुश्वास या दुराग्रह हो । एक स्वयंसेवक होने के नाते से हमें स्वभाषा के प्रति स्वाभिमान को मन में जागृत करना ही है उसी समय दूसरी भाषा एवं भाषिकों का उचित सम्मान भी करना होगा, करना ही है ।
यही व्यवहार एक स्वयंसेवक का दूसरे स्वयंसेवक के प्रति होगा तो हमारी बंधुता बढ़ेगी।
मेरा ऐसा व्यक्तिगत विचार है कि ऐसा विचार करना भी एक स्वयंसेवक के लिए "स्वबोध" है ।
©️ समीर कुलकर्णी
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